Gao Shala

Gao Shala

जयगुरुदेव

भारतीय संस्कृति में, हिन्दु धर्म में गाय को पूजनीय स्वीकारा गया है। सभी हिन्दु जातियाँ गाय को पवित्र व पूजनीय मानती हैं और उसे गौ माता का सर्वोच्च स्थान देती हैं। गाय को पालना, गाय की पूजा करना बहुत श्रेयकर माना जाता है। देश भर में बड़ी-बड़ी गौशालायें जगह-जगह बनी हुई हैं और वहाँ गायों का पालन-पौषण होता है। प्रश्न उठेगा कि गाय को ही क्यों पवित्र और पावन मानकर उसे माता का सर्वोच्च स्थान दिया गया है?

1. आध्यात्मिक अर्थः-जगत में सभी जीव जन्म-मरण के जाल में फंसे हुए हैं। सभी जीवों में मानव शरीर में आए जीवों को सबसे विकसित, समझदार माना जाता है। सबसे समझदार होते हुए भी मानव जन्म-मरण के जाल में पूरी तरह से फंसा हुआ है। संसार में सभी मनुष्य किसी न किसी रूप में ईश्वर को मानते ही हैं किन्तु फिर भी बुद्धिमान मनुष्य ने कभी इस पर विचार नहीं किया कि हम कौन हैं? कहाँ से आए? कैसे यहाँ आकर जन्म-मरण में फंस गए? मानव ने इस संसार को ही अपना घर समझ लिया है। जीवनभर इस संसार में अपने पेट की खातिर सभी तरह कि तरीके अपनाता है। यह चक्र क्या है कैसे इससे छुटकारा होगा यह हमें परम पूज्य बाबा जयगुरुदेव जी महाराज ने स्पष्ट रूप से समझाया।

मुख्य रूप से काल भगवान की इस सृष्टि में चैरासी लाख योनियाँ हैं। जितनी भी जीवात्मायें इस जगत में उतारी गईं वे किसी न किसी शरीर रूपी जेलखाने में कैद की गईं हैं। काल भगवान ने जब इस सृष्टि का विधान बनाया था तो उसके अनुसार मनुष्य शरीर में सभी जीवों को कर्म करने की आजादी दे दी गई। मनुष्य शरीर में जन्म लेने वाले सभी जीवों को छूट है कि वे कैसा भी कर्म करने के लिए स्वतंत्र हैं। अच्छा करो या बुरा करो। इसके अच्छे-बुरे का निर्णय करने के लिए बुद्धि, विवेक दिया। मनुष्य अब हर कार्य को करने से पहले सोच ले कि जो कार्य वह करने जा रहा है वह गलत है या सही। अब जैसा भी कर्म किया उसके परिणाम को भोगने के लिए काल भगवान ने स्वर्ग-नर्क बना दिया। मनुष्य शरीर की आयु पूरी होने के बाद जब जीवात्मा धर्मराज के दरबार में जाती है तो वहाँ उसे कर्मानुसार स्वर्ग या नर्क में भेज दिया जाता है। इसके बाद चैरासी लाख योनियों का निर्माण कर दिया।

माना कोई मनुष्य अपने जीवन काल में पापकर्मों के कारण नर्क भेजा जाता है तो नर्क में अपनी सजा पूरी करने के बाद जब उसे वहाँ से निकाला जाता है तब वह जीवात्मा चैरासी लाख योनियों में डाल दी जाती है। दण्ड की यह प्रक्रिया केवल नर्क में ही नहीं समाप्त हुई, उसे चैरासी लाख योनियों से गुजरना होता है। चैरासी लाख योनियों में चार खानें-अण्डज, पिण्डज, उष्मज और स्थावर। इन योनियों में से निकलने में ही कई हजारों वर्ष अथवा युग बीत जाते हैं तब जाकर जीवात्मा मनुष्य शरीर की अधिकारी होती है। ऐसा काल की सृष्टि के विधानानुसार इसलिए है कि जितने भी जीव संसार के जन्म-मरण के जाल में फंस गए हैं उन्हें यहाँ से निकलने के लिए पवित्र और शुद्ध होना आवश्यक है। सभी तरह की मलीन जीवात्माओं को चैरासी योनियों में साफ किया जाता है। धीरे-धीरे जीव इन योनियों से गुजरता हुआ साफ होता हुआ अंततः गाय और बैल के शरीर में आता है। जिस समय जीव गाय-बैल के शरीर को प्राप्त होता है उस समय वह अपने पिछले कर्मों से मुक्त होता जाता है। गाय व बैल के शरीर छोड़ने के बाद जीव को सीधे मनुष्य शरीर मिलता है। गाय को पावन इसलिए भी कहा जाता है कि उसके शरीर में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास है। जब गाय या बैल अपनी आयु पूरी करके मनुष्य शरीर में आते हैं तो वे बहुत शालीन, शान्त, मृदुभाषी, कोमल हृदय, दयावान, संस्कारी, धर्मावलम्बी होते हैं। आज समाज में ऐसे ही लोगों की अधिक आवश्यकता है।

जब गाय या बैल को उसकी आयु पूरी होने से पहले ही काट दिया जाता है तो वह जीवात्मा प्रेत योनि में चली जाती है और अपनी शेष आयु वह प्रेत योनि में पूरा करती है। यह विधान है कि अकाल मृत्यु को प्राप्त हुआ जीव अपनी शेष आयु प्रेत योनि में पूरा करता है। अतः गाय को काटने के बाद उसकी जीवात्मा प्रेत योनि में अपना शेष समय व्यतीत करती है। अब यह समझ लिया जाए कि प्रेत योनि में क्या होता है। प्रेत का मुँह बहुत छोटा, सुई की नोक के बराबर व पेट बहुत बड़ा होता है। प्रेत का भोजन सुगंधि, खुशबू होता है। मुँह बहुत छोटा, सुई की नोक के बराबर होने के कारण उसका पेट कभी नहीं भरता और वह इस कारण से चैबीसों घण्टे बहुत चिल्लाती, चीखती है, तड़पती है, बहुत जोर से चित्कार करती है। अब जब वह जीवात्मा अपनी शेष आयु प्रेत योनि में पूरा कर लेती है तब उसे मनुष्य शरीर में आने का अवसर प्राप्त होता है। सामाजिक दृष्टिकोण व असरः-अब समाज में अक्सर देखने में आता है कि किसी के घर में बच्चे ने जन्म लिया। लोगों ने देखा कि बेटी हुई है, बेटा हुआ है और प्रसन्नता से सभी खुश हो होते हैं और जश्न मनाते हैं। कुछ समय बाद जब बच्चा कुछ बड़ा हुआ तो देखा कि जरा-जरा सी बात पर बच्चा-बच्ची चिल्लाते हैं, चीखते हैं। घर में लोग समझते हैं कि देखा बच्चा कितना खुश है। कभी-कभी ऐसा भी देखने में आता है कि बच्चा माता-पिता पर ही हाथ-पैर से वार करता है। लोग देखकर खुश होते हैं कि बच्चा कितना चंचल है, पर ऐसा नहीं है। समझना यह है कि यह वही आत्मा है जो गाय-बैल के शरीर में काट दी गई थी और प्रेत योनि में चली गई थी अब वही आत्मा अपना समय पूरा होने पर मनुष्य शरीर में आ गई है। और अपने प्रेत योनि के स्वभाव के कारण ही वह चीखती-चिल्लाती है। अब वही जीवात्मा जब बच्चे के रूप में और बड़ी होती है तो घर में लड़ाई-झगड़ा, मार-पीट आज घर-घर में हो रहा है।

जयगुरुदेव गौशाला का उद्देश्यः-जयगुरुदेव आश्रम में परम पूज्य बाबा जयगुरुदेव जी महाराज के द्वारा स्थापित गौशाला का उद्देश्य चैरासी काटकर गाय-बैल के शरीरों में आए जीवों का आजन्म पालन-पौषण करना। जितने भी गाय-बैल आश्रम की गौशाला में हैं उनका अंतिम स्वांस तक पालन किया जाता है। इसके फलस्वरूप गाय-बैल अपनी आयु पूरी कर लेते हैं तो वे अपनी अंतिम स्वांस पूरी होने पर ही शरीर छोड़ते हैं और उसके उपरान्त वे मनुष्य शरीर में जन्म लेते हैं। इस प्रकार से समाज में ऐसे जीवों को जन्म मिले जो मनुष्य शरीर में आने पर संस्कारी, शालीन, शान्त, विवेकशील और एक अच्छे समाज के निर्माण में सहायक हों। इसी प्रकार से हमारे समाज में उच्च संस्कार, शाकाहार, सदाचार, आदर-सम्मान, उच्च चरित्र, नशा-मुक्त, माताओं-बहनों की सुरक्षा व सम्मान इत्यादि का समावेश होगा। गौशालाः- जयगुरुदेव आश्रम में गौशाला बहुत विशाल है और उसमें हजारों गोवंश हैं। नित्य ही दो-तीन गोवंश का जन्म गोशाला में होता है। इनको समय से चारा दिया जाता है। इनके पानी पीने के लिए गोशाला में सभी जगह पानी के टब लगे हैं जिनमें गाय प्यास लगने पर पानी पी लेती हैं और उसके पश्चात् टब स्वतः पानी से भर जाता है। गायों की देखभाल के लिए सेवादार हैं जो उनकी देखभाल करते हैं।

साण्डशालाः-जयगुरुदेव आश्रम में गायों की तरह यहाँ सैंकड़ों साण्ड भी हैं जो अन्य किसी काम में नहीं लिए जाते हैं। उन्हें जन्म से चारा-पानी दिया जाता है उन्हें बेचा नहीं जाता है। वे अपना पूरा जीवन साण्डशाला में व्यतीत करके अंतिम समय में समय छोड़ने के बाद मनुष्य शरीर के अधिकारी हो जाते हैं।

जयगुरुदेव धर्म प्रचारक संस्था व सत्संगी जनों का यही उद्देश्य व भाव है कि वे गायों का सम्मान से सही मायने में पालन-पौषण करते हैं और उन्हें समय से पहले बेचते नहीं हैं।