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जयगुरुदेव
जयगुरुदेव बाल्य-बालक विद्यादान विद्यालय-मथुरा
परम पूज्य बाबा जयगुरुदेव जी महाराज ने सर्व प्रथम 10 जुलाई 1952 में बनारस से सत्संग व जीवात्मा कल्याण का कार्य आरम्भ किया। अपनी इस अध्यात्मिक यात्रा के शुभारम्भ में ही उन्हें इस बात का अनुभव हो गया कि समाज का प्रत्येक जीव चाहे धनी-निर्धन हो कोई सुखी नहीं है। जो लोग सत्संग के लिए आते थे उनमें सत्संग से अधिक शान्ति प्राप्त करने की, दुख दूर करने की व अन्य कई तकलीफें दूर करने की ललक अधिक थी। गुरु महाराज ने जब देखा कि जब जीव को शान्ति मिलेगी तभी वह सत्संग को बु(ि में उतार सकता है तो उन्होंने समाज के हर पहलू पर गौर करते हुए उन्हें शान्ति का मार्ग भी बताया और जीवन के प्रत्येक पहलुओं के लिए मानव का मार्ग प्रशस्त किया।
इसी क्रम में उन्होंने देखा कि समाज के निर्धन वर्ग के तमाम बच्चों को उनके भविष्य को संवारने के लिए शिक्षा भी सुलभ नहीं हो पाती है। शिक्षा के अभाव में उनका भविष्य अंधकारमय है। तब 26 जुलाई 1082 को उन्होंने मथुरा में एक विद्यालय की स्थापना की जिसमें कक्षा एक से कक्षा 8 तक शिक्षा आरम्भ हुई और जिसका नाम ‘जयगुरुदेव शिशु विहार’ रखा। पूजन के बाद स्वयं बाबा जी ने कुछ बच्चों को अ, आ बोलकर पढ़ाना आरम्भ किया और इसके साथ उन्होंने पांच बच्चों की नियुक्ति कर दी। विद्यालय खुलने के 4-5 दिन में ही इसमें 175 बच्चों ने दाखिला ले लिया था। बाद में इसी विद्यालय का नाम उन्होंने बदलकर ‘जयगुरुदेव बाल्य-बालक विद्यादान विद्यालय’ कर दिया गया। जयगुरुदेव धर्म प्रचारक संस्था, मथुरा द्वारा संचालित इस विद्यालय में कक्षा एक से कक्षा दस तक के बालक-बालिकाओं को शिक्षा प्रदान की जाती है। किसी भी बच्चे से शुल्क के रूप में कोई पैसा नहीं लिया जाता है। जयगुरुदेव धर्म प्रचारक संस्था, मथुरा सभी बच्चों को निःशुल्क शिक्षा मिले इसके लिए उनकी शिक्षा का सभी खर्च वहन करती है। विद्यालय में बच्चों को निःशुल्क पुस्तकें, काॅपियाँ, पेंसिल, रबर, इत्यादि प्रदान किया जाता है।
विद्यालय की दो शाखायें हैं। पहली प्राथमिक विद्यालय जिसमें कक्षा एक से कक्षा पांच तक बालक-बालिकाओं को शिक्षा दी जाती है। दूसरी माध्यमिक विद्यालय जिसमें कक्षा छः से कक्षा दस तक के विद्यार्थियों को शिक्षा दी जाती है। विद्यालय बालिकाओं एवं बालकों के लिए एक निश्चित ड्रैस कोड है। बालिकायें नीला कमीज, सफेद सलवार व सिर पर सफेद स्कार्फ पहनती हैं। बालकों के लिए सफेद कमीज व नीला पैंट तथा सिर पर सफेद टोपी पहनना अनिवार्य है। सभी बालक-बालिकायें अपने इसी डेªस कोड में आते हैं। विद्यालय में अध्यापन के लिए लगभग 16 शिक्षक हैं। विद्यालय का भवन संस्था द्वारा निर्मित है और उसमें सभी कक्षाओं के लिए कमरे बनाये गए हैं। आज इस विद्यालय में लगभग 1200 से अधिक बच्चे अध्यनरत् हैं।
पूरे जिले में एक आदर्श विद्यालय के रूप में स्थापित यह विद्यालय प्रसि( है। इस विद्यालय में वर्ष में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में विद्यार्थी उत्साह से भाग लेते हैं व मुख्य अतिथि के रूप में बड़े प्रशासनिक अधिकारियों सहित अन्य विभागों से भी अधिकारी सम्मिलित होते हैं।