गुरु-शिष्य संवाद
प्रश्नः स्वामी जी ! प्रायः देखा जाता है कि कुछ | दिन सत्संग में रहकर पूरे गुरु को सेवक क्यों छोड़कर चला जाता है?
उत्तरः जो लोग सत्संग में प्रवेश हुए। वचन और सन्देश परमार्थ का जीव कल्याण के सुने । दिल में | उमंग उठी और कुछ भय हुआ कि नर देही सुफल करना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। उन्होंने गुरु से प्रार्थना की कि मुझे उपदेश भजन- ध्यान करने का दें। गुरु दया लुटाते हैं। जीवों पर सदा दया करना ही उनका असली ध्येय रहता है। जिस दिन उपदेश ! रखा गया, नामदान देने का, उसी दिन बहुत से लोग लालच वश जमा हो जाते हैं। चाहें उनमें अनेक प्रकार की धन-दौलत, बच्चों तथा नामवरी, बीमारी -दूर कराने आदि की रहती हैं। नाम उपदेश पाँच नामों का उनको दे दिया गया। साधन करने लगे । फिर देखा-देखी करने लगे। समय मिला किया। न मिला, न किया। यदि नाम प्राप्त हुआ तो रहे, नहीं । तो किसी न किसी बहाने निकलने का रास्ता खोजने लगे और गुरु के रास्ते की बुनियाद सत्संग में रहते हुए काटना शुरू किया। अनेक प्रकार के ऐब गुरु और सत्संगियों के निकालना शुरू किया और कुछ समय बाद अलग हो गये। मतलब अपना प्राप्त किया । प्राप्त करने के बाद निकल भागे। ऐसे जो ! लोग पूरा नामभेद गुरु से प्राप्त करने के बाद सुमिरन, ध्यान, भजन अपने जीव उपकार के लिए नहीं करते ॥ हैं; वह लोग हरामखोर हैं। उनके ऊपर भ्रम का भूत चढ़ जाता है। मालिक से घमण्ड करते हैं। मालिक के दरबार में पहुँचकर गाली-गलौज करना चाहते हैं। उनके लिए चौरासी का फाटक खुल गया है। वह ॥ अवश्य चौरासी जायेंगे। जो हिन्दू मुसलमान होता है,

वह बड़ा अपने को कट्टर मुसलमान कहता है। जो स्त्री अपने पति को त्याग देती है और दूसरों से उसका सम्बन्ध हो जाता हैं, वह बहुत अपने को पतिव्रता बनती है। जो भाँड़ स्वाँग दिखाते हैं, वह अपने को । बहुत बुद्धिमान कहते हैं। कायर सदा बहादुरी की डींग हाँकता है। जो गुरु को छोड़कर चले जाते हैं, वह अपने को बहुत बड़ा दास कहते हैं। ऊपर लिखी हुई (कही हुई) एक भी बात सच्ची नहीं होती।

कबीर, नानक, रैदास, स्वामी जी महाराज ! आदि-आदि महात्माओं के पास आकर लोग उपदेश लिए और यह कहते हुए गये कि ये सब ढोंग है। यहाँ । सच्चाई नहीं है। हमारे समय में बहुत से आये और साधन किया, तरक्की हुई, परन्तु माया ने झकोला | मार दिया और गिर गये। जब उन्हें सँभालना चाहा तो माया रस लेते हुए चले गये। आगे भी बहुत जायेंगे। यह नई बात नहीं है।

स्वामी जी! माया से बचाव कैसे हो ? माया की रगड़ से कोई बिरला बचेगा। माया ने रस्सी की तरह बट रक्खा है। जब तक महापुरुषों की दया पूरी नहीं होगी, तब तक जीव का निकलना इस माया से परे, मुश्किल है। होशियार ! चौरासी से बचो, नहीं तो मुफ्त में नर देही खाली जा रही है। गुरु के पास आने वाले उपदेश और भेद लेकर चले जाते हैं। उनके ऊपर काल का सदा डंडा बजता रहेगा।। नर्कों में डालकर जीवों को सदा पीटते रहेंगे। उसी के कर्म भाग्य अच्छे खुले, जो गुरु के ! पास पहुँच गया और गुरु आज्ञा का पालन करता और गुरु की रहनी के अनुसार कर्म करेगा। साथ । मन को संसार के प्रपंच से हटाकर सुरत-शब्द की साधना में लगावेगा ।
आसन अटल जमाओ तिल पर, घेर घुमड़ घट भीतर आओ।



ईमानदारी में बरक्कत है। पर अपराधी बुद्धि ने सबको नष्ट कर दिया। बहुमत में काम कुछ नहीं होता। धमकियाँ दी जाती हैं। यूनियनों से कोई लाभ नहीं हुआ; बल्कि लड़ाई, झगड़े और बढ़ गये।

वक्त गुरु की शरण में जाये बिना न मोक्ष होगा, न जीव का अहंकार नष्ट होगा। अहंकार ही जीव को परमात्मा से दूर रखता है।
महात्मा ही आपको भजन करना बतायेंगे और कोई नहीं। जब वो नामदान देंगे तो यही कहेंगे कि आप कमाई करो यानि भजन करो। आप उनकी बात – ध्यान से सुनते और समझ लेते तो आत्मा का धन ॥ इकट्ठा कर लेते।
जो याद रखने वाली चीजें हैं, उसे आप भूल गये। काम न आने वाली चीजें याद करते रहे। गुरु ने आपको नामदान दिया तो बड़ी खुशी थी कि ये भजन करेगा। पर आपने उनकी खुशी को, उनकी इच्छा को दफना दिया।
बाबा जी के पास क्या है? वह क्या देते हैं I और वह क्या चाहते हैं? उसे आप लोगों को बतायें। चुप नहीं रहना है। एक अच्छे समाज का निर्माण करो। बुरे लोग भी अच्छे हो जाते हैं। धीरे-धीरे पवित्र हो जाते हैं। पवित्र भावना हो जाती है। पवित्र प्यार हो जाता है और लोक ठीक हो जाता है। और जब महात्मा मिल जाते हैं तो लोगों को, जीवों को उठा लेते हैं। शुद्धि के लिए कान का, आँख का, शरीर का भाव-भाव दिखाते हैं और अन्तर में साधना करा लेते हैं। कर्मों का बदला देना होता है। लोग खाते समय इसका तनिक भी ध्यान नहीं देते हैं। खूब मौज से सभा-सोसायटी में बैठ-बैठ कर खाते हैं। किन्तु इन सबका बदला देना पड़ेगा। यहाँ तक कि कोई साधक किसी अच्छे सत्संगी के यहाँ भी खाता है तो । उसे उसका बदला देना पड़ता है। अप्रैल 1973 * समय बड़ा पहलवान है। उसकी प्रतीक्षा सबने की। हमें और तुम्हें भी इन्तजार करना पड़ेगा।

तुम्हारे जल्दी करने से काम न होगा। जैसे बच्चा आज पैदा हो और तुम आज ही चाहो कि वह पैदा होते ही दफ्तर में जाकर काम करने लगे, तो ऐसा में । नहीं हो सकता है। पाँच साल तो वह खेल-कूद गुजारेगा। फिर स्कूल भेजा जायेगा। वहाँ पढ़े-लिखे, । तब कहीं जाकर इस लायक बनेगा कि दफ्तर में !
जाकर काम करे। वह भी ठीक काम करेगा कि नहीं, कोई ठीक नहीं ।
समय की प्रतीक्षा सबको करनी पड़ी और जो काम समय से होता है, वही अच्छा होता है। लेकिन अब इतनी भीड़ सड़कों पर आकर मिले तो समझ लो कि अब परिवर्तन बहुत नजदीक है और महात्मा आये, उन्होंने जो पेड़ लगाया, उसका फल न उन्होंने खाया, न उनके समय में लोगों ने खाया। मैं ऐसा प्रयत्न कर रहा हूँ कि जो पेड़ मैं लगा रहा हूँ, उसका फल मैं भी खाऊँ और तुम सब लोग खाओ।-1982, 61 दिवसीय काफिले में


मनुष्य चाहता क्या है? वह चाहता है धन दौलत, महल, हवेली, साजो-सामान, नाचरंग की। महफिलें, ऐश और आराम का जीवन। उसी में सुख देखने की आदत पड़ गई है। मगर यह नहीं जानता कि जिनको यह सब नसीब है, तो भी वे सुखी नहीं हैं। और दिन दूने रात चौगुने पाप कर्म करके भी उनका पेट नहीं भरता। याद रखो, पेट कभी भरने वाला नहीं, इच्छायें कभी खत्म होने वाली नहीं हैं। वासनाओं का अन्त नहीं होगा। जब तक इन सबकी पूर्ति के लिए प्रयत्न होते रहेंगे, यह कभी पूरे होने वाले नहीं हैं।
कुछ साधना में, भजन में खुद भी जागो और लोगों को भी लगाये रहो। ईश्वर आराधना में देखकर, कुछ सुनकर, कुछ अनुमान से, कुछ साधना से ज्ञान प्राप्त हो जाता है। हर प्रकार की विद्या लोक ।
की, ऐसे ही आया करती है। जब तक आप सुनोगे नहीं तो कैसे आयेगा ?- विशेष प्रतिनिधि (संकलन) पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पण्डित भया न कोय, ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पण्डित होय।

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